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गरीब किसानों की पीड़ा देखी नहीं गयी

गरीब किसानों की पीड़ा देखी नहीं गयी

संत अपनी पीड़ा तो सह लेते हैं पर उनका हृदय समाज की  पीड़ा को नहीं सह पाता है ।

 एक बार पूज्य बापूजी कार द्वारा प्रवास कर रहे थे । गाड़ी काफी तेज गति से जा रही थी । इतनी तेज भागती कार से भी पूज्यश्री ने खेत में काम करते एक बूढ़े गरीब व्यक्ति को देखा । उसने गन्ने तो काट लिये थे पर वह उन्हें उठाकर अपने सिर पर नहीं रख पा रहा था । 

बापूजी ने कार-चालक को तुरंत कहा : ‘‘गाड़ी रोको । बापूजी गाड़ी से उतरे और किसान के पास पहुँचे । पूज्यश्री सेवक को भी भेज सकते थे परंतु उस वृद्ध किसान की लाचारी को देखकर अपने को रोक न सके । उसकी पीड़ा हरने, उसको सांत्वना देने बापूजी स्वयं गये और बोझ अपने हाथों से उठाकर उसके सिर पर रखा । 

वह किसान चला गया, फिर वहाँ खेतों में काम कर रहे अन्य किसानों,मजदूरों से भी पूज्यश्री ने हालचाल पूछा : ‘‘क्या काम करते हो, कितना पैसा मिलता है ? आदि । 
बापूजी ने उनकी बातें ध्यान से सुनीं । दया के सागर गुरुदेव को यह जानकर बहुत पीड़ा हुई कि इन्हें दिनभर कड़ी मेहनत के बाद भी अत्यंत कम मजदूरी मिलती है ! ये मजदूर अपना घर कैसे चलाते होंगे ? इतनी महँगाई में भोजन,कपड़े बच्चों की पढ़ाई आदि का कैसे गुजारा करते होंगे ! 

उस इलाके में शक्कर की एक फैक्टरी थी जिसके लिए ये मजदूर,किसान गन्ने भेजते थे । उस क्षेत्र में पूज्यश्री का सत्संग-कार्यक्रम भी था,जिसमें उस फैक्टरी के मुख्य व्यक्ति भी आये थे । बापूजी ने मंच पर आते ही कहा कि ‘‘देखो, किसानों का खयाल करो । वे बेचारे बड़े दुःखी हैं । उनकी व्यथा मेरे द्वारा बुलवा रही है । तुम लाखों कमाओ, ठीक है लेकिन गरीबों का हक मत छीनो । उनका शोषण नहीं पोषण होना चाहिए । किसानों, मजदूरों को सताओगे तो कुदरत तो सब देखती है । उनको न्याय मिलना चाहिए । अगर आपके द्वारा अन्याय होगा तो आप देख लेना । भगवान के दरबार में देर है लेकिन अंधेर नहीं है । उनको मेहनताना उनके परिश्रम के अनुसार मिलना चाहिए । लोगों की व्यथा आह बनकर निकलती है । बापूजी ने लगभग आधे घंटे तक समाज की स्थिति तथा किसानों की पीड़ा पर सत्संग किया । 

जब हम भगवान और भगवान के प्यारे संतों के श्रीचरणों में अपनी परेशानी निवेदित कर देते हैं, उनके शरणागत हो जाते हैं तो संसार की कैसी भी विकट परिस्थिति क्यों न हो, उस समस्या का हल निश्चित ही निकल आता है । 
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण के सामने समस्या रख दी तो अर्जुन को तुरंत हल मिल गया । अर्जुन का विषाद भी ‘विषादयोग' बन गया और गीता का परम ज्ञान उन्हें मिला । परंतु सुदामा ने भगवान से कुछ कहा भी नहीं, मन में ही बात रखी फिर भी भगवान ने उनके मन की बात जान ली, तुरंत परिणाम नहीं दिखा पर घर पहुँचने के बाद पता चला कि झोपड़ी की जगह महल खड़ा है और दरिद्रता की जगह सम्पन्नता लहरा रही है । यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ । पूज्यश्री के संकल्प, सद्भाव एवं सत्प्रयासों का ऐसा सुप्रभाव पड़ा कि अगले माह से ही फैक्टरी-प्रबंधन ने किसानों के गन्नों का मूल्य और मजदूरों की मजदूरी बढ़ा दी, जिससे उनमें खुशहाली छा गयी ।
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