ऐसी थी स्वाध्याय की लगन

ऐसी थी स्वाध्याय की लगन

जो विद्यार्थी अपने जीवन का अनमोल समय व्यर्थ के उपन्यास,पत्र-पत्रिकाएँ, अश्लील चलचित्र व वेबसाइटें आदि पढ़ने-लिखने में बर्बाद करते रहते हैं, उनके लिए तो यह प्रसंग विशेष प्रेरणादायी है।

पूज्य बापूजी को बचपन से ही स्वाध्याय की बड़ी रुचि थी। पूज्य श्री के सत्संग में आता है।
‘‘किसी ने मुझसे कहा नहीं था शास्त्र-अध्ययन के लिए,कुदरती प्रेरणा हुई तो अपने जेब-खर्च के पैसों से भगवद्गीता ले आया और पढता था। उसके छठे अध्याय पर मेरा चित्त ज्यादा ठहर जाता था। यह श्लोक मेरा बचपन का खूब पढ़ा हुआ है :

प्रशान्तात्मा विगतभीब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः ।।

भगवान कहते हैं: 'ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित,भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्त वाला और मेरे परायण हो के स्थित होवे ।'
(गीता ६.१४)

प्रशान्तात्मा ‘प्र' उपसर्ग है; आधिभौतिक,आधिदैविक व आध्यात्मिक ये मानसिक शक्तियाँ नहीं, परम शांति मिल जाती है।"

✍🏻ये प्रेरणादायी प्रसंग सुनाकर बच्चों को उनको जेबखर्च का सही उपयोग,समय का सही उपयोग करना सिखा सकते हैं।

🙌🏻संकल्प - हम भी पूज्य बापूजी की तरह नियमित स्वाध्याय करेंगे।

📚ऋषि प्रसाद /जुलाई २०१८
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