सच्चा धन और महाधनवान

सच्चा धन और महाधनवान

पंढरपुर में एक दानवीर साहूकार रहता था । वह अपने शरीर के वजन के बराबर धन-सम्पत्ति आदि तौलकर याचकों को देता था । उसे अपने धन-वैभव, दानवीरता का बड़ा अहंकार था । एक बार उसने सोचा, ‘क्यों न नामदेव को कुछ दान दिया जाय । वैसे भी वह बेचारा गरीब है और रात-दिन भगवान का नाम जपता रहता है ।’ 

साहूकार ने नामदेवजी को बुलाकर उन्हें अपना हेतु बताया तो वे बोले : ‘‘देखो भाई ! मैं भिक्षुक नहीं हूँ, अतः आपका दान लेने की मेरी इच्छा नहीं है । रही मेरी गरीबी की बात तो जब मुझे भोजन की आवश्यकता होती है तो भगवान पूरी कर देते हैं । उनकी कृपा से मेरे पास ऐसा अलौकिक धन है, जिसके सामने आपकी यह सम्पत्ति कुछ भी नहीं है ।’’

साहूकार बिगड़ते हुए बोला : ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है ?’’
नामदेवजी बोले : ‘‘तुम्हारी और हमारी सम्पत्ति की तुलना करने से इस बात का निर्णय हो जायेगा ।’’
साहूकार ने अपनी कुछ सम्पत्ति तराजू के एक पलड़े में रख दी और नामदेवजी ने एक तुलसी-पत्र पर ‘राम’ नाम का पहला अक्षर ‘रा’ लिखकर दूसरे पलड़े में रख दिया । तुलसी-पत्रवाला पलड़ा नीचे बैठ गया और साहूकार का पलड़ा ऊपर उठ गया । साहूकार के पास जो कुछ धन था, वह सब उसने पलड़े में लाकर रख दिया परंतु तुलसी-पत्रवाला पलड़ा ऊपर नहीं उठा । तब साहूकार ने अपना दान, धर्म, तीर्थयात्रा इत्यादि का पुण्य भी संकल्प करके उस पलड़े पर चढ़ा दिया लेकिन तब भी वह पलड़ा ऊपर ही रहा । 

साहूकार का सारा गर्व गल गया । उसकी आँखों में आँसू आ गये । वह अत्यंत भावविभोर होकर नामदेवजी के चरणों में गिर पड़ा और प्रार्थनापूर्वक हाथ जोड़ते हुए बोला : ‘‘परमात्मा के प्यारे महाराज ! मैं नाहक धन-वैभव के मद में चूर होकर अपने को बड़ा धनवान, दानवीर तथा हीरे, मोती, जवाहरात को ही सब कुछ मानता था लेकिन आज आपकी करुणा-कृपा से मेरा अहंकार चूर-चूर हो गया है । अब आप मुझ दास पर दया कीजिये कि मेरा शेष जीवन उस आत्मधन को पाने में लगे जिसे आपने पाया है ।’’

आत्मधन पाने का मार्गदर्शन ‘श्री गुरुग्रंथ साहिब’ में संत नामदेवजी की वाणी में आता है :
पारब्रह्मु जि चीन्हसी आसा ते न भावसी ।।...
...छीपे के घरि जनमु दैला गुर उपदेसु भैला ।। संतह कै परसादि नामा हरि भेटुला ।।
‘जो परब्रह्म की अनुभूतियों को संचित करेगा, उसे अन्य सांसारिक इच्छाएँ अच्छी नहीं लगेंगी ।

जो राम की (भगवान की) भक्ति को मन में बसायेगा, उसका मन स्थिर होगा । संसार-सागर तो विषयों का वन (गोरखधंधा, उलझन) है, मन उसे कैसे पार कर सकेगा ? यह मन तो माया के मिथ्यात्व को ही (सत्य समझकर) भूला पड़ा है । नामदेवजी कहते हैं कि यद्यपि मेरा जन्म छीपी के घर हुआ, फिर भी सद्गुरु का उपदेश मिल जाने से मैंने संतों की कृपा से प्रभु से भेंट कर ली है, परमात्मा को पा लिया है ।’ 

(ऋषि प्रसाद : अक्टूबर 2015)

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