Stories Search

बहुत गयी थोड़ी रही

बहुत गयी थोड़ी रही

एक बार किसी राजा के नगर में नट-दम्पति ने खेल दिखाना आरम्भ किया। राजा का स्वभाव से बहुत ही कृपण था। उसे खेल तो अच्छा लग रहा था पर मन में डर था कि अगर वह खेल की सराहना करेगा तो उसे कुछ-न-कुछ देना पड़ेगा। काफी देर बाद नटनी ने थककर इशारे से अपने पति को कहा :
"रात घड़ी भर रह गई,पिंजर थाक्या आय ।
यो राजा रीझै नहीं,मधरी ताल बजाय ।।
तो नट बोला :
बहुत गयी थोड़ी रही,थोड़ी भी अब जाय।
नट कहै सुण नटणी,ताल भंग क्यों खाय ।।

नट का इतना कहना था कि राजकुमारी ने अपने गले का हार नट की तरफ फेंक दिया । राजकुमार ने भी अपना दुशाला नट को दे दिया।
बाद में राजा ने राजकुमारी से पूछा :"तूने अपना बहुमूल्य हार नट को क्यों दे दिया ?"
राजकुमारी :"पिताजी ! आप अपने अत्यंत कृपण स्वभाव के कारण मेरा विवाह नहीं कर रहे थे तो मै कल सारे ज़ेवरात व कुछ धन लेकर दीवान-पुत्र के साथ भागना चाह रही थी । परंतु नट के वचनों ने मेरी आँखे खोल दीं । थोड़े से वर्षों के लिए ताल भंग क्यों खाय ? मैने अपनी योजना ढहा दी और इस नट को हितकारी वचन सुनाने के एवज में अपना हार दे दिया ।"
राजकुमार के पूछने पर उसने कहा :"आपके अत्यंत कृपण स्वभाव के कारण मै किसी प्रकार की सुख-सुविधा नहीं भोग पा रहा था । अतः मै आपको मारकर राजगद्दी पर बैठना चाहता था । लेकिन नट के वचनों ने मेरा हृदय परिवर्तित कर दिया इसलिए मैने उसे अपना दुशाला उतारकर दे दिया।"
राजा को अपने जीवन के प्रति बड़ी ग्लानि हुई। दूसरे ही दिन उसने राजकुमारी का विवाह दीवान-पुत्र के साथ करा दिया और अपने पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं ईश्वर-भजन में लग गया । ईश्वर हमें किसी न किसी व्यक्ति,वस्तु या परिस्तिथि को माध्यम बनाकर,नट-नटी को माध्यम बनाकर अपने परम सुखस्वरूप की ओर लगाना चाहते हैं,जरूरत है तो बस आँख खुली रखने की,विवेक सजग रखने की ।

📚लोक कल्याण सेतु/अक्टूबर 2016
Previous Article दृढ़निश्चयी गांधीजी
Next Article प्यार से पोषण करें सदगुणों का
Print
10513 Rate this article:
3.7
Please login or register to post comments.
RSS