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सत्पथ का सुनिश्चय

सत्पथ का सुनिश्चय

क्षणिक भावावेश में आकर आदर्शों और सिद्धांतों की राह पर बढ़ने का संकल्प तो कई लोग कर लेते हैं पर दृढ़ता के अभाव में वे प्रलोभनों से विचलित हो जाते हैं। परंतु लाल बहादुर शास्त्री जी कभी भी अपने आदर्शों से विचलित नहीं हुए।

लाल बहादुर जी के विद्यालय के पास ही अमरूद (जामफल) का एक बगीचा था। जब वे पाँचवीं कक्षा में पढ़ते थे, तब एक दिन उनके चार-पाँच शरारती दोस्त अमरूद तोड़कर खाने के
इरादे से बगीचे की जा निकले।

वे लाल बहादुरजी को भी अपने साथ ले गये। बगीचे की छोटी दीवार को जब वे लड़के लाँघने लगे, तब लालबहादुर जी ने अंदर जाने से आनाकानी की लेकिन साथियों ने उन्हें अंदर कूदने के लिए मजबूर कर दिया।

वे अंदर तो गये पर अमरूद न तोड़कर चुपचाप एक तरफ खड़े हो गये। लेकिन उन्होंने गुलाब का एक फूल जरूर तोड़ लिया।
इसी बीच अचानक माली वहाँ आ धमका। सब लड़के भाग गये पर लालबहादुर जी यह सोचकर खड़े रहे कि "जब मैंने चोरी नहीं की तो माली मुझ पर क्यों बिगड़ेगा ?"

पर हुआ इसका उलटा। माली ने उन्हें ही पकड़ लिया और अमरूद न तोड़ने की उनकी सफाई पर बिना ध्यान दिये दो चाँटे लगा दिये। लालबहादुर जी रोने लगे और सिसकते हुए बोलेः "मुझे मत मारो। मैं बिना बाप का लड़का हूँ।"

माली ने उन्हें दो चाँटे और लगाये और बिगड़कर बोलाः "बिना बाप का है तब तेरी यह करनी है। तुझे तो नेक चलन वाला और ईमानदार होना चाहिए। जा, भाग जा यहाँ से।"

इस घटना का लालबहादुर जी के बाल मन पर भारी प्रभाव पड़ा। उन्होंने मन-ही-मन निश्चय किया कि ʹभविष्य में मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा, जिससे मेरी या मेरे परिवारवालों की बदनामी हो और मुझे नीचा देखना पड़े।ʹ
वे भारत के प्रधानमंत्री बने तब भी एक दिन भी अपने इस आदर्श से विचलित नहीं हुए। उऩ्होंने अपने उज्जवल, निःस्वार्थ जीवन में भ्रष्टाचार का दाग नहीं लगने दिया।
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