महात्मा का मूल्य
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महात्मा का मूल्य

Priceless Mahatma's Life

ईरान में फरीदुद्दीन अत्तार आत्मज्ञान के ऊँचे शिखर पर पहुँचे हुए महापुरूष थे। उस समय ईरान और तुर्कस्तान के बीच घमसान युद्ध चल रहा था। तुर्कस्तान हार रहा था। एक बार तुर्कियों ने शक में फरीदुद्दीन अत्तार को पकड़ लिया और घोषणा कर दी कि अमुक तारीख को फरीदुद्दीन अत्तार को फाँसी पर लटकाया जायगा।ईरान में समाचार पहुँचे। सर्वत्र हाहाकार मच गया।

नगर के अमीर लोग इकट्ठे हुए, चर्चा-विचारणा की और नगरसेठ ने तुर्कियों को सन्देश भेजा कि फरीदुद्दीन अत्तार के वजन के बराबर हीरे, जवाहरात तौलकर हमसे ल लो और हमें वापस लौटा दो। उन्हें फाँसी पर मत चढ़ाओ।तुर्की शासकों ने उनकी विनती को अस्वीकार कर दिया। तब ईरान के  युवकों ने सन्देश भेजा कि अगर आप लोग हमारे देश के एक आदमी को फाँसी पर लटकाकर अपने देश का गौरव बढ़ाना चाहते हो तो उनके बदले में हम नवयुवक फाँसी पर चढ़ने के लिए तैयार हैं। तुम फरीदुद्दीन अत्तार को छोड़ दो।तुर्की लोग नहीं माने।

आखिर ईरान के बादशाह ने सन्देशा भेजा कि आप फरीदुद्दीन अत्तार को फाँसी पर न चढ़ायें। उनके बदले में आपको चाहिए तो ईरान का तख्त दे सकता हूँ।तुर्कियों ने सोचा, जिस तख्त का कब्जा लेने के लिए भीषण युद्ध कर रहे हैं वह तख्त सिर्फ एक आदमी के बदले में दे रहे हैं ? अजीब बात है ! इस आदमी में जरूर कोई रहस्य होगा। फाँसी का हुक्म केन्सल कर दिया गया। सन्देशवाहकों के द्वारा मिलन का दिन और स्थान निश्चित हुआ और तुर्कस्तान के अधिकारी लोग फरीदुद्दीन अत्तार को ले आये। ईरान के सम्राट को पूछाः"एक इन्सान के बदले में आप ईरान का तख्त देने को तैयार हो ? क्या बात है ?"

ईरान का सम्राट कहता हैः "सत्ता का तख्त तो आता-जाता है जबकि ऐसे खुदा के प्यारे पूर्ण पुरूष तो कभी-कभी ही मिलते हैं। मेरे देश में ऐसे पुरूष की रक्षा न कर सकूँ, सँभाल न कर सकूँ तो मेरे देश पर लांछन लगेगा। इतिहास में हमारे देश पर काला धब्बा लगा रहेगा, दुनियाँ गाती रहेगी कि पूरा देश मिलकर भी खुदा के प्यारे एक फकीर की सेवा भी न कर सका। मेरा देश दुनियाँ की नजरों में तो गिरेगा ही, उस मालिक की नजरों में भी गिर जायेगा। जिसके दिल में पूरे मालिक प्रकट हुए हैं ऐसे महान् संत की सेवा न कर सकना यह पूरे ईरान का तख्त देने को तैयार हूँ। देश के तख्त से भी कहीं अधिक मूल्यवान है इन संत पुरूष का जीवन।"जहाँ त्याग है, प्रेम है, समता की निगाहें हैं वहाँ सुलह और शान्ति होने में क्या देर लगेगी ?

दोनों देशों के बीच समझौता हो गया। युद्ध रोक दिया गया। दोनों देश अपने-अपने ढंग से जीने लगे।जिसके जीवन में आत्मज्ञान आ जाता है वह स्वयं तो शान्त और आनन्दित रहता है लेकिन बड़ी-बड़ी दुःखद अवस्थाओं में भी कोई उसके करीब आ जाता है तो उसकी दुःखद अवस्था भी विदा लेने लगती है, सुख में बदलने लगती है। ऐसा आत्मज्ञान का प्रभाव है। ऐसा आत्मज्ञान पाने वाला ज्ञानी अत्यंत दुर्लभ है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः।।

''बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त पुरूष 'सब कुछ वासुदेव ही है' ऐसा जानता है वह महात्मा पुरूष अत्यंत दुर्लभ है।"(गीताः 7.19)

ऐसा आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए अपने मन की दिशा थोड़ी बदलनी चाहिए। कई लोग कहते हैं कि साधना में हमारा मन लगता नहीं। मन क्यों नहीं लगता है ? मन की दिशा बदलने की कला हम नहीं जानते। मन को जहाँ सुख मिलता है वहाँ बार-बार जाता है। मन को जहाँ दुःख दिखता है वहाँ से वापस लौटता है।इन्द्रियों का स्वभाव है, जहाँ सुख मिलता है वहाँ भागती हैं। बुद्धि का स्वभाव है कि वह परिणाम को देखती है।

आदमी जब बुद्धि का आदर करने लगता है तब विषय-वासना से बचने की कोशिश में होता है। बुद्धि का आदर नहीं करता तो इन्द्रियाँ मन को घसीट कर ले जाती हैं विषय-विकारों के खड्डों में।मन की रूचि बदलने की आवश्यकता है। आप अपनी स्वतन्त्रता पर ध्यान दें। आप जो देखना चाहे देख सकते हैं, जहाँ जाना चाहें जा सकते हैं। मन को जहाँ भेजना चाहो भेज सकते हो। आप अपनी स्वतन्त्रता भूल गये और जिसके कारण आप पराधीन होते हो उसीका पोषण करते हो इसीलिए मन भागता है, वश में नहीं रहता, जहाँ लगाना चाहते हो वहाँ नहीं लगता।आप अपनी स्वतन्त्रता पर ध्यान दो। मन और इन्द्रियों के पीछे क्यों घसीटे जाते हो ? तुम कितने स्वतन्त्र हो !कितने ही पैसे आये और गये, तुम वही के वही। कितने ही दुःख आये और गये, तुम वही के वही। कितने ही मान के प्रसंग आये और गये, तुम वही के वही। कितनी अवस्थाएँ आयी और गई, तुम वही के वही। कितने शरीर आये और गये, तुम वही के वही। कितने ही दिन आये और गये, तुम वही के वही। कितनी ही रातें आयी और गई, तुम वही के वही।तुम तो असंग चैतन्य हो। परिस्थितियों में आसक्त हो जाते हो, पकड़ लगाते हो इसलिए मन तुमको दगा देता है। परिस्थितियों के साथ अगर पकड़ न लगाओ तो मन तुम्हारा अनुगामी होने लगता है।

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