दीनवत्सल संत कबीर जी
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दीनवत्सल संत कबीर जी

कबीर जी दर्जी का व्यवसाय करते थे। कपड़ा बेचकर होनेवाली आमदनी का आधा हिस्सा माँ नैमा को देकर बचा हिस्सा दरिद्रनारायण में बाँट के वे आनंदित होते थे। 

एक दिन कबीरजी बाजार में कपड़ा बेचने गये । एक साधु उनसे आकर बोला : जोरों की सर्दी पड़ रही है,ओढने को कपड़ा नहीं है।'

कबीर जी ने कपड़े का आधा थान फाडकर देना चाहा मगर साधु ने कहा : ''भाई ! आधे से क्या होगा? पूरा दे दो।'

उदारात्मा कबीरजी ने क्षणभर भी सोचे बिना पूरा थान दिया। फिर सोचा, 'आज का सौदा पूरा हुआ मगर नैमा माई अब घर में घुसने न देगी।

कबीर जी सब समेटकर घर के बजाय दूसरी दिशा में चल दिया। एक सेठ वहाँ उनका यह अहैतु की करुणा-कृपा से भरा दीनवत्सल स्वभाव देख रहा था । वह भावविभोर हो गया कि कैसे महापुरुष है ये ! जो आप लुटकर भी दूसरे का दिल खुश रखते हैं। बड़े श्रद्धाभाव से वह बहुत सारा सीधा-सामान अर्पण करने के लिए बैलगाड़ी पर लादकर कबीर जी के घर पहुँचा। माई ने वह सब लेने से इनकार कर दिया। इतने में कबीरजी आये और सेठ के श्रद्धाभाव को स्वीकार कर वह सारा सामान गरीबों में बांट दिया। अपने पास कुछ न रखा । कैसी दीनवत्सलता !

महापुरुष का देना तो देना है ही,परंतु उनका स्वीकार करना भी जरूरतमंदों,गरीबों की सेवा का साधन बन जाता है। उनके हाथ से तो सेवा होती है,परंतु उनकी ज्वलंत प्रेरणा से अन्य कितने ही हाथ गरीबों की सेवा में लग जाते हैं। वर्तमान में ऐसे दीनवत्सल, सबको अपना ही आत्मस्वरूप मानकर सेवा करने की प्रेरणा व संदेश देने वाले किन्हीं महापुरुष को अपने दर्शन किया है ? यदि किया है तो आप बहुत ही भाग्यशाली हैं।

📚ऋषि प्रसाद/जून २०१३/१९
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