16 बार मौत के मुँह से बचाया
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16 बार मौत के मुँह से बचाया

एक दिन एक बहन ने मुझे फोन किया : दीदी ! मैंने सुना है कि आप बापूजी से मिलकर आती हो। आप जब अगली बार जाओ तो कृपया बापूजी के चरणो में मेरा निवेदन रखना।"
 
"आप कौन हो ? मैं आपको जानती भी नहीं हूँ ।"

"मेरा नाम रीना कौशल सतराला है । मैं सिडनी (ऑस्ट्रेलिया) में रहती हूँ। 27 सितंबर 2010 को मुझे ब्रेन हेमरेज (दिमाग की नस फट जाना) हो गया।"

 मैंने कहा :" क्या ? ब्रेन हेमरेज ! तुम जानती हो किसको कहते हैं ?"
 बोली :"हाँ, ब्रेन हैमरेज होने के बाद सिर में भयंकर पीड़ा चालू हो गई थी। मैंने अपना सिर जोर से दबा लिया और बापूजी को पुकारने लगी। गुरुदेव की प्रेरणा से उस हालत में मैं खुद ही पड़ोसी के पास पहुँची।ऐसा लग रहा था जैसे बापूजी मेरे साथ चल रहे हैं। पड़ोसी नजदीक के अस्पताल में ले गए। वहाँ से सिडनी के प्रसिद्ध 'वेस्टमेट अस्पताल' भेजा गया और वहाँ उसी दिन मेरा पहला ऑपरेशन हुआ ।

सब लोग हैरान थे कि ऐसा ब्रेन हैमरेज का मरीज कभी नहीं देखा जो खुद चलकर चिकित्सा के लिए पहुँचा हो।
 29 सितंबर को दूसरा ऑपरेशन हुआ,जिसमें मेरे सिर का दाँया हिस्सा काट कर निकाल लिया गया। जब मुझे होश आया तो मैंने पतिदेव से पूज्य बापूजी का श्रीचित्र  व गुरुगीता मंगवायी और वही मंत्रजप और पाठ रोज करती थी। 18 अक्टूबर को तीसरे ऑपरेशन के बाद 25 अक्टूबर को मेरी अस्पताल से छुट्टी हो गई।"

 💠सूर्यदेव से प्रकटे बापूजी💠

"उसके बाद मेरा घाव रिस रहा था। 15 नवंबर को जब मैं अस्पताल इलाज के लिए गई तो डॉक्टरों ने इंफेक्शन बताकर भर्ती कर लिया और अगले दिन चौथा ऑपरेशन किया। 7 दिसंबर को भयंकर पीड़ा हो रही थी। अस्पताल के जिस कमरे में मुझे रखा गया था,उसमें 10-12 मिनट के लिए सूर्य की रोशनी आती थी। मैं सूर्यनारायण के सामने बैठकर बापूजी को आर्तभाव से पुकारने लगी। उस समय सिर से खून की और आँखों से आँसुओ की धारा बह रही थी । तभी सूर्यदेव से बापूजी श्वेत वस्त्र में प्रकट हुए और मुझसे पूछा :" बेटी क्यों रो रही है?"
 मैं प्रणाम करके बोली : "बापूजी बहुत पीड़ा हो रही है। अभी 4 ऑपरेशन हो चुके हैं,घबराहट हो रही है।"
 
"बेटी! बचपन में साइकिल चलाती थी,कब गिर जाती थी,चोट लगती थी तो क्या वे दर्द व चोटें याद हैं ?"
 "नहीं,उन्हें भूल गई।"
 बापूजी मुस्कुराए,बोले : "इन सब बातों को भी भूल जा कि ऑपरेशन हो रहे हैं।"

"फिर मैं क्या करूं ?" 
गुरुदेव शांत होकर बोले : "अपने अंदर जा !  तेरे अंदर ही परमात्मा है । बाहर तो  दु:खों से भरा मिथ्या संसार है ।"
फिर देखते-देखते बापूजी मेरे अंदर ही समाहित हो गए।मेरी आँखें बंद हुईं तो अंदर ही बापूजी के दर्शन हुए।उसके बाद पीड़ा सहने की असीम शक्ति आ गयी।
वहाँ कमरे के बाहर जो वार्ड बॉय था, उसने मुझसे पूछा :"आप किससे बातें कर रही थी?"
 मैंने कहा :" मैं अपने पूज्य गुरुदेव से बात कर रही थी।"
 वैसे तो स्थूल रूप में बापूजी कभी ऑस्ट्रेलिया नहीं गए परंतु भक्त की पुकार पर समर्थ सद्गुरु कहीं भी और कभी भी प्रकट होकर सहायता करते हैं।
 उस बहन ने बताया कि इस दौरान पूरे साल भर वह भजन लिखती तथा गाती भी थी ।
मैंने कहा :" तुम्हारा अनुभव हमारा बात मार्गदर्शन करेगा। मैं तुम्हें मीडिया में भी ले जाऊँगी।" "दीदी ! जरूर मैं अपनी सारी मेडिकल रिपोर्ट लेकर चलूँगी। मेरे गुरुजी में मुझे 9 महीने अपने गर्भ में रखा है। मैं जिंदा नहीं बचती।"

 💠चमत्कारी लड़की💠

"9 महीने बापू जी ने कैसे गर्भ में रखा ?"
"दीदी ! लगातार नौ महीनों तक मेरे सोलह ऑपेरशन हुए। बापूजी हर पल मेरे साथ रहे हैं,मुझे इसका अनुभव भी होता रहा है।
डॉक्टरों की पूरी टीम हैरान थी कि यह जिंदा कैसे बच गई ! यदि बच भी गई तो स्वस्थ कैसे ? न ही याददाश्त समाप्त हुई,न ही पक्षाघात (लकवा) हुआ! मैं आज भी पूरे होशो-हवास में हूँ एवं मुझे सबकुछ याद है। अस्पताल में सभी मुझे 'चमत्कारी लड़की' बोलते थे। मैंने शादी के तीन साल तक ब्रह्मचर्य रखा था।हम अभी भी संयम से रहते हैं। पूज्य बापूजी कहते हैं :"जो ब्रह्मचर्य रखता है,उसकी सारी शक्तियाँ उसके साथ होती हैं।"
    
     "हाँ, मैंने पहचान लिया"
मैंने कहा :"मैं बापूजी के पास जाकर तुम्हारे बारे में क्या बोलूँ ?"

वह बोली :"दीदी ! बापूजी को आप सिर्फ इतना कहना कि आपने अपनी बच्ची को गर्भ में रखा,पाला-पोसा और आज छोड़ के जेल क्यों चले गए ? आप वापस आ जाओ।" 
मैंने कहा :"ठीक है।"

उसके कुछ दिन बाद मेरा जोधपुर जाना हुआ। मैं जैसे ही बापूजी को उस बहन के बारे में बोली तो बापूजी बोले :"हाँ, उस गुलाब के फूल वाली बच्ची को बोल देना,मैंने पहचान लिया। उसको बोलना खुश रहे,प्रसन्न रहे।बापूजी जल्दी बाहर आयेंगे।"

अब गुलाब के फूल के बारे में तो उसने बोला ही नहीं था। मैंने सोचा,'पता नहीं,बापूजी ने उसे पहचाना है या नहीं ? मैंने आकर उस बहन को फोन पर फूलवाली बात बतायी।
वह बोली :"दीदी ! मैं धन्य हो गयी ! गुरुदेव ने मुझे पहचान लिया। जब मैं बापूजी के दर्शन के  लिए गयी थी तो मैंने गुलाब का फूल अर्पित किया था।"

मैंने सोचा : देखो,इसकी कितनी श्रद्धा है ! और श्रद्धा कैसे-कैसे चमत्कार कर देती है!९ मस्तिष्क के और ७ अन्य ऑपेरशनों के बाद भी कोई जिंदा बचा हो ऐसा मैंने न कभी सुना,न कभी देखा और उसमें भी वह पूरी तरह स्वस्थ्य हो। पूज्य श्री की कृपा के ऐसे अनेकानेक अनुभव हर साधक के जीवन में होते ही रहते हैं।

जो मीडियावाले बोलते हैं कि बापूजी से लोगों की श्रद्धा टूट गयी है,उन्हें समझना चाहिए कि ऐसे लाभ जिनके जीवन में हुए हैं उन्हें कौन हिला सकता है ? साधकों की श्रद्धा न टूटी है,न टूट सकती है।

📚ऋषि प्रसाद/दिसम्बर २०१४
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